बद्र और महर दो हैं नाम उन के
इक जमाली है एक जलाली है
सख़ी लख़नवी
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बद्र और महर दो हैं नाम उन के
इक जमाली है एक जलाली है
सख़ी लख़नवी
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बहुत ख़्वाब-ए-ग़फ़लत में दिन चढ़ गया
उठो सोने वालो फिर आएगी रात
सख़ी लख़नवी
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बर्ग-ए-गुल आ मैं तेरे बोसे लूँ
तुझ में है ढंग यार के लब का
सख़ी लख़नवी
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बर्ग-ए-गुल आ मैं तेरे बोसे लूँ
तुझ में है ढंग यार के लब का
सख़ी लख़नवी
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बोसा हर वक़्त रुख़ का लेता है
किस क़दर गेसू-ए-दोता है शोख़
सख़ी लख़नवी
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चर्ख़ पर बद्र जिस को कहते हैं
यार का साग़र-ए-सिफ़ाली है
सख़ी लख़नवी
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