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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

बद्र और महर दो हैं नाम उन के
इक जमाली है एक जलाली है

सख़ी लख़नवी




बद्र और महर दो हैं नाम उन के
इक जमाली है एक जलाली है

सख़ी लख़नवी




बहुत ख़्वाब-ए-ग़फ़लत में दिन चढ़ गया
उठो सोने वालो फिर आएगी रात

सख़ी लख़नवी




बर्ग-ए-गुल आ मैं तेरे बोसे लूँ
तुझ में है ढंग यार के लब का

सख़ी लख़नवी




बर्ग-ए-गुल आ मैं तेरे बोसे लूँ
तुझ में है ढंग यार के लब का

सख़ी लख़नवी




बोसा हर वक़्त रुख़ का लेता है
किस क़दर गेसू-ए-दोता है शोख़

सख़ी लख़नवी




चर्ख़ पर बद्र जिस को कहते हैं
यार का साग़र-ए-सिफ़ाली है

सख़ी लख़नवी