जाँ-ब-लब लम्हा-ए-तस्कीं मिरी क़िस्मत है 'शमीम'
बे-ख़ुदी फिर मुझे दीवाना बनाती क्यूँ है
शख़ावत शमीम
जाँ-ब-लब लम्हा-ए-तस्कीं मिरी क़िस्मत है 'शमीम'
बे-ख़ुदी फिर मुझे दीवाना बनाती क्यूँ है
शख़ावत शमीम
रात हिस्सा है मिरी उम्र का जी लेने दे
ज़िंदगी छोड़ के तन्हा मुझे जाती क्यूँ है
शख़ावत शमीम
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आँखों से पा-ए-यार लगाने की है हवस
हल्क़ा हमारे चश्म का उस की रिकाब हो
सख़ी लख़नवी
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अजी फेंको रक़ीब का नामा
न इबारत भली न अच्छा ख़त
सख़ी लख़नवी
अजी फेंको रक़ीब का नामा
न इबारत भली न अच्छा ख़त
सख़ी लख़नवी
बात करने में होंट लड़ते हैं
ऐसे तकरार का ख़ुदा-हाफ़िज़
सख़ी लख़नवी
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