ये मरना जीना भी शायद मजबूरी की दो लहरें हैं
कुछ सोच के मरना चाहा था कुछ सोच के जीना चाहा है
सहर अंसारी
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अगर शुऊर न हो तो बहिश्त है दुनिया
बड़े अज़ाब में गुज़री है आगही के साथ
सहबा अख़्तर
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अगर शुऊर न हो तो बहिश्त है दुनिया
बड़े अज़ाब में गुज़री है आगही के साथ
सहबा अख़्तर
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बयान-ए-लग़्ज़िश-ए-आदम न कर कि वो फ़ित्ना
मिरी ज़मीं से नहीं तेरे आसमाँ से उठा
सहबा अख़्तर
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दिल के उजड़े नगर को कर आबाद
इस डगर को भी कोई राही दे
सहबा अख़्तर
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दिल के उजड़े नगर को कर आबाद
इस डगर को भी कोई राही दे
सहबा अख़्तर
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हमें ख़बर है ज़न-ए-फ़ाहिशा है ये दुनिया
सो हम भी साथ इसे बे-निकाह रखते हैं
सहबा अख़्तर
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