आओ इक सज्दा करें आलम-ए-मदहोशी में
लोग कहते हैं कि 'साग़र' को ख़ुदा याद नहीं
साग़र सिद्दीक़ी
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आज फिर बुझ गए जल जल के उमीदों के चराग़
आज फिर तारों भरी रात ने दम तोड़ दिया
साग़र सिद्दीक़ी
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आज फिर बुझ गए जल जल के उमीदों के चराग़
आज फिर तारों भरी रात ने दम तोड़ दिया
साग़र सिद्दीक़ी
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अब अपनी हक़ीक़त भी 'साग़र' बे-रब्त कहानी लगती है
दुनिया की हक़ीक़त क्या कहिए कुछ याद रही कुछ भूल गए
साग़र सिद्दीक़ी
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अब कहाँ ऐसी तबीअत वाले
चोट खा कर जो दुआ करते थे
साग़र सिद्दीक़ी
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अब कहाँ ऐसी तबीअत वाले
चोट खा कर जो दुआ करते थे
साग़र सिद्दीक़ी
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अब न आएँगे रूठने वाले
दीदा-ए-अश्क-बार चुप हो जा
साग़र सिद्दीक़ी
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