तुम्हें तो क़ब्र की मिट्टी भी अब पुकारती है
यहाँ के लोग भी उकताए हैं चले जाओ
साबिर ज़फ़र
उम्र भर लिखते रहे फिर भी वरक़ सादा रहा
जाने क्या लफ़्ज़ थे जो हम से न तहरीर हुए
साबिर ज़फ़र
उस से बिछड़ के एक उसी का हाल नहीं मैं जान सका
वैसे ख़बर तो हर पल मुझ तक दुनिया भर की आती रही
साबिर ज़फ़र
उस से बिछड़ के एक उसी का हाल नहीं मैं जान सका
वैसे ख़बर तो हर पल मुझ तक दुनिया भर की आती रही
साबिर ज़फ़र
वो एक बार भी मुझ से नज़र मिलाए अगर
तो मैं उसे भी कोई मेहरबाँ शुमार करूँ
साबिर ज़फ़र
वो जाग रहा हो शायद अब तक
ये सोच के मैं भी जागता हूँ
साबिर ज़फ़र
वो जाग रहा हो शायद अब तक
ये सोच के मैं भी जागता हूँ
साबिर ज़फ़र

