EN اردو
2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

'रियाज़' एहसास-ए-ख़ुद्दारी पे कितनी चोट लगती है
किसी के पास जब जाता है कोई मुद्दआ' ले कर

रियाज़ ख़ैराबादी




'रियाज़' तौबा न टूटे न मय-कदा छूटे
ज़बाँ का पास रहे वज़्अ का निबाह रहे

रियाज़ ख़ैराबादी




रोते जो आए थे रुला के गए
इब्तिदा इंतिहा को रोते हैं

रियाज़ ख़ैराबादी




रोते जो आए थे रुला के गए
इब्तिदा इंतिहा को रोते हैं

रियाज़ ख़ैराबादी




सय्याद तेरा घर मुझे जन्नत सही मगर
जन्नत से भी सिवा मुझे राहत चमन में थी

रियाज़ ख़ैराबादी




शैख़-जी गिर गए थे हौज़ में मयख़ाने के
डूब कर चश्मा-ए-कौसर के किनारे निकले

रियाज़ ख़ैराबादी




शैख़-जी गिर गए थे हौज़ में मयख़ाने के
डूब कर चश्मा-ए-कौसर के किनारे निकले

रियाज़ ख़ैराबादी