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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

मेरे घर में ग़ैर के डर से कभी छुप जाइए
ग़ैर के घर में छपे थे आज किस की डर से आप

रियाज़ ख़ैराबादी




मेरी सज-धज तो कोई इश्क़-ए-बुताँ में देखे
साथ क़श्क़े के है ज़ुन्नार-ए-बरहमन कैसा

रियाज़ ख़ैराबादी




मेरी सज-धज तो कोई इश्क़-ए-बुताँ में देखे
साथ क़श्क़े के है ज़ुन्नार-ए-बरहमन कैसा

रियाज़ ख़ैराबादी




मिरे घर मिस्ल तबर्रुक के ये सामाँ निकला
आस्तीं क़ैस की फ़रहाद का दामाँ निकला

रियाज़ ख़ैराबादी




मुफ़लिसों की ज़िंदगी का ज़िक्र क्या
मुफ़्लिसी की मौत भी अच्छी नहीं

रियाज़ ख़ैराबादी




नासेह के सर पर एक लगाई तड़ाक़ से
फिर हाथ मल रहे हैं कि अच्छी पड़ी नहीं

रियाज़ ख़ैराबादी




नासेह के सर पर एक लगाई तड़ाक़ से
फिर हाथ मल रहे हैं कि अच्छी पड़ी नहीं

रियाज़ ख़ैराबादी