नई फ़ज़ा में नई दोस्ती पनप न सकी
घरों के बीच पुरानी अदावतें थीं बहुत
रज़्ज़ाक़ अरशद
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नई फ़ज़ा में नई दोस्ती पनप न सकी
घरों के बीच पुरानी अदावतें थीं बहुत
रज़्ज़ाक़ अरशद
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हर दिसम्बर इसी वहशत में गुज़ारा कि कहीं
फिर से आँखों में तिरे ख़्वाब न आने लग जाएँ
रेहाना रूही
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जो भीक माँगते हुए बच्चे के पास था
उस कासा-ए-सवाल ने सोने नहीं दिया
रेहाना रूही
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जो भीक माँगते हुए बच्चे के पास था
उस कासा-ए-सवाल ने सोने नहीं दिया
रेहाना रूही
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कहानी ख़त्म हुई और ऐसी ख़त्म हुई
कि लोग रोने लगे तालियाँ बजाते हुए
रहमान फ़ारिस
तेरे बिन घड़ियाँ गिनी हैं रात दिन
नौ बरस ग्यारह महीने सात दिन
रहमान फ़ारिस
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