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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

नश्शा-ए-यार का नशा मत पूछ
ऐसी मस्ती कहाँ शराबों में

रज़ी रज़ीउद्दीन




क़ल्ब-ओ-जिगर के दाग़ फ़रोज़ाँ किए हुए
हैं हम भी एहतिमाम-ए-बहाराँ किए हुए

रज़ी रज़ीउद्दीन




तमाम रात तिरा इंतिज़ार होता रहा
ये एक काम यही कारोबार होता रहा

रज़ी रज़ीउद्दीन




तमाम रात तिरा इंतिज़ार होता रहा
ये एक काम यही कारोबार होता रहा

रज़ी रज़ीउद्दीन




तुम न थे तो यहाँ पे कोई न था
आज कितने दिवाने बैठे हैं

रज़ी रज़ीउद्दीन




तुम्हारे शहर में क्यूँ आज हू का आलम है
सबा इधर से गुज़र कर उधर गई कि नहीं

रज़ी रज़ीउद्दीन




उस का जल्वा दिखाई देता है
सारे चेहरों पे सब किताबों में

रज़ी रज़ीउद्दीन