नश्शा-ए-यार का नशा मत पूछ
ऐसी मस्ती कहाँ शराबों में
रज़ी रज़ीउद्दीन
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क़ल्ब-ओ-जिगर के दाग़ फ़रोज़ाँ किए हुए
हैं हम भी एहतिमाम-ए-बहाराँ किए हुए
रज़ी रज़ीउद्दीन
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तमाम रात तिरा इंतिज़ार होता रहा
ये एक काम यही कारोबार होता रहा
रज़ी रज़ीउद्दीन
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तमाम रात तिरा इंतिज़ार होता रहा
ये एक काम यही कारोबार होता रहा
रज़ी रज़ीउद्दीन
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तुम न थे तो यहाँ पे कोई न था
आज कितने दिवाने बैठे हैं
रज़ी रज़ीउद्दीन
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तुम्हारे शहर में क्यूँ आज हू का आलम है
सबा इधर से गुज़र कर उधर गई कि नहीं
रज़ी रज़ीउद्दीन
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उस का जल्वा दिखाई देता है
सारे चेहरों पे सब किताबों में
रज़ी रज़ीउद्दीन
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