वो न आए तो तू ही चल 'रंगीं'
इस में क्या तेरी शान जाती है
रंगीन सआदत यार ख़ाँ
ज़ुल्म की टहनी कभी फलती नहीं
नाव काग़ज़ की कहीं चलती नहीं
रंगीन सआदत यार ख़ाँ
अगर चिलमन के बाहर वो बुत-ए-काफ़िर-अदा निकले
ज़बान-ए-शैख़ से सल्ले-अला सल्ले-अला निकले
रंजूर अज़ीमाबादी
बुतों में किस बला की है कशिश अल्लाह ही जाने
चले थे शौक़-ए-काबा में सनम-ख़ाने में जा निकले
रंजूर अज़ीमाबादी
बुतों में किस बला की है कशिश अल्लाह ही जाने
चले थे शौक़-ए-काबा में सनम-ख़ाने में जा निकले
रंजूर अज़ीमाबादी
देता है मुझ को चर्ख़-ए-कुहन बार बार दाग़
उफ़ एक मेरा सीना है उस पर हज़ार दाग़
रंजूर अज़ीमाबादी
दिखा कर ज़हर की शीशी कहा 'रंजूर' से उस ने
अजब क्या तेरी बीमारी की ये हकमी दवा निकले
रंजूर अज़ीमाबादी

