फ़िक्र-ए-तामीर में हूँ फिर भी मैं घर की ऐ चर्ख़
अब तलक तू ने ख़बर दी नहीं सैलाब के तईं
क़ाएम चाँदपुरी
गंदुमी रंग जो है दुनिया में
मेरी छाती पे मूँग दलता है
क़ाएम चाँदपुरी
गर यही ना-साज़ी-ए-दीं है तो इक दिन शैख़-जी
फिर वही हम हैं वही बुत है वही ज़ुन्नार है
क़ाएम चाँदपुरी
गर्म कर दे तू टुक आग़ोश में आ
मारे जाड़े के ठिरे बैठे हैं
क़ाएम चाँदपुरी
गिर्या तो 'क़ाएम' थमा मिज़्गाँ अभी होंगे न ख़ुश्क
देर तक टपकेंगे बाराँ के शजर भीगे हुए
क़ाएम चाँदपुरी
हाथों से दिल ओ दीदा के आया हूँ निपट तंग
आँखों को रोऊँ या मैं करूँ सरज़निश-ए-दिल
क़ाएम चाँदपुरी
हम दिवानों को बस है पोशिश से
दामन-ए-दश्त ओ चादर-ए-महताब
क़ाएम चाँदपुरी

