हर दम आने से मैं भी हूँ नादिम
क्या करूँ पर रहा नहीं जाता
क़ाएम चाँदपुरी
हर तरफ़ ज़र्फ़-ए-वज़ू भरते हैं ज़ाहिद हुई सुब्ह
साथ उठ हम भी सुराही में मय-ए-नाब करें
क़ाएम चाँदपुरी
हर उज़्व है दिल-फ़रेब तेरा
कहिए किसे कौन सा है बेहतर
क़ाएम चाँदपुरी
होना था ज़िंदगी ही में मुँह शैख़ का सियाह
इस उम्र में है वर्ना मज़ा क्या ख़िज़ाब का
क़ाएम चाँदपुरी
ईराद कर न पढ़ के मिरा ख़त कि ये तमाम
बे-रब्तियाँ हैं समरा-ए-हंगाम-ए-इश्तियाक़
क़ाएम चाँदपुरी
इलाही वाक़ई इतना ही बद है फ़िस्क़-ओ-फ़ुजूर
पर इस मज़े को समझता जो तू बशर होता
क़ाएम चाँदपुरी
जिस चश्म को वो मेरा ख़ुश-चश्म नज़र आया
नर्गिस का उसे जल्वा इक पश्म नज़र आया
क़ाएम चाँदपुरी

