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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

यूँ बरसती हैं तसव्वुर में पुरानी यादें
जैसे बरसात की रिम-झिम में समाँ होता है

क़तील शिफ़ाई




यूँ लगे दोस्त तिरा मुझ से ख़फ़ा हो जाना
जिस तरह फूल से ख़ुशबू का जुदा हो जाना

क़तील शिफ़ाई




यूँ तसल्ली दे रहे हैं हम दिल-ए-बीमार को
जिस तरह थामे कोई गिरती हुई दीवार को

क़तील शिफ़ाई




ज़िंदगी मैं भी चलूँगा तिरे पीछे पीछे
तू मिरे दोस्त का नक़्श-ए-कफ़-ए-पा हो जाना

क़तील शिफ़ाई




यही तो होता है शीशे के कारोबार का हश्र
उजड़ गया है अचानक हरा-भरा बाज़ार

क़ौस सिद्दीक़ी




आ ऐ 'असर' मुलाज़िम-ए-सरकार-ए-गिर्या हो
याँ जुज़ गुहर ख़ज़ाने में तनख़्वाह ही नहीं

क़ाएम चाँदपुरी




अहल-ए-मस्जिद ने जो काफ़िर मुझे समझा तो क्या
साकिन-ए-दैर तो जाने हैं मुसलमाँ मुझ को

क़ाएम चाँदपुरी