सारी सारी रात मैं जागा
वो मेरी आँखों में सोया
प्रेम भण्डारी
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शंकर बना के लोग मुझे पूजते रहे
मजबूरियों में ज़हर निगलना पड़ा मुझे
प्रेम भण्डारी
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शाम हुई तो सूरज सोचे
सारा दिन बेकार जले थे
प्रेम भण्डारी
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तेरे मेरे बीच नहीं है ख़ून का रिश्ता फिर भी क्यूँ
तेरी आँख के सारे आँसू मेरी आँख से बहते हैं
प्रेम भण्डारी
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तेरी चाहत की है इतनी शिद्दत
पा लिया तुझ को तो मर जाऊँगा
प्रेम भण्डारी
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आएगी हर तरफ़ से हवा दस्तकें लिए
ऊँचा मकाँ बना के बहुत खिड़कियाँ न रख
प्रेम कुमार नज़र
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बहुत लम्बी मसाफ़त है बदन की
मुसाफ़िर मुब्तदी थकने लगा है
प्रेम कुमार नज़र
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