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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

पैवंद की तरह नज़र आता है बद-नुमा
पुख़्ता मकान कच्चे घरों के हुजूम में

ओवेस अहमद दौराँ




सब मस्तियों में फेंको न पत्थर इधर उधर
दीवानो! इस दयार में शीशे के घर भी हैं

ओवेस अहमद दौराँ




शायद किसी की याद का मौसम फिर आ गया
पहलू में दिल की तरह धड़कने लगी है शाम

ओवेस अहमद दौराँ




उन मकानों में भी इंसान ही रहते होंगे
रौनक़ें जिन में नहीं आप की महफ़िल की सी

ओवेस अहमद दौराँ




वो लहू पी कर बड़े अंदाज़ से कहता है ये
ग़म का हर तूफ़ान उस के घर के बाहर आएगा

ओवेस अहमद दौराँ




ये सेहन-ए-गुलिस्ताँ नहीं मक़्तल है रफ़ीक़ो!
हर शाख़ है तलवार यहाँ, जागते रहना

ओवेस अहमद दौराँ




ये ज़ीस्त कि है फूल सी मिट जाए बला से
गुलचीं से मगर बर-सर-ए-पैकार ही रहिए

ओवेस अहमद दौराँ