तबाह कर तो दूँ ज़ाहिर-परस्त दुनिया को
ये आईने भी मिरे लोग ही बनाते हैं
नोमान शौक़
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तौक़-ए-बदन उतार के फेंका ज़मीं से दूर
दुनिया के साथ चलने से इंकार कर दिया
नोमान शौक़
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तिरे बग़ैर कोई और इश्क़ हो कैसे
कि मुशरिकों के लिए भी ख़ुदा ज़रूरी है
नोमान शौक़
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तुम तो सर्दी की हसीं धूप का चेहरा हो जिसे
देखते रहते हैं दीवार से जाते हुए हम
नोमान शौक़
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उस का मिलना कोई मज़ाक़ है क्या
बस ख़यालों में जी उठा हूँ मैं
नोमान शौक़
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उस ने हँस कर हाथ छुड़ाया है अपना
आज जुदा हो जाने में आसानी है
नोमान शौक़
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वो मेरे लम्स से महताब बन चुका होता
मगर मिला भी तो जुगनू पकड़ने वालों को
नोमान शौक़
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