वो साँप जिस ने मुझे आज तक डसा भी नहीं
तमाम ज़हर सुख़न में मिरे उसी का है
नोमान शौक़
वो तंज़ को भी हुस्न-ए-तलब जान ख़ुश हुए
उल्टा पढ़ा गया, मिरा पैग़ाम और था
नोमान शौक़
वो तो कहिए आप की ख़ुशबू ने पहचाना मुझे
इत्र कह कर जाने क्या क्या बेचते अत्तार लोग
नोमान शौक़
वो तो कहिए आप की ख़ुशबू ने पहचाना मुझे
इत्र कह के जाने क्या क्या बेचते अत्तार लोग
नोमान शौक़
ये ख़्वाब कौन दिखाने लगा तरक़्क़ी के
जब आदमी भी अदद में शुमार होने लगे
नोमान शौक़
ज़रा ये हाथ मेरे हाथ में दो
मैं अपनी दोस्ती से थक चुका हूँ
नोमान शौक़
इक सानेहा सा दफ़्न हूँ लेकिन कभी कभी
सदियों की क़ब्र से भी उठाया गया हूँ मैं
नोमान इमाम

