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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

ख़ुदा ऐ काश 'नाज़िश' जीते-जी वो वक़्त भी लाए
कि जब हिन्दोस्तान कहलाएगा हिन्दोस्तान-ए-आज़ादी

नाज़िश प्रतापगढ़ी




न होगा राएगाँ ख़ून-ए-शहीदान-ए-वतन हरगिज़
यही सुर्ख़ी बनेगी एक दिन उनवान-आज़ादी

नाज़िश प्रतापगढ़ी




अपनी दुनिया तो बना ली थी रिया-कारों ने
मिल गया ख़ुल्द भी अल्लाह को फुसलाने से

नज़्म तबा-तबाई




असीरी में बहार आई है फ़रियाद-ओ-फ़ुग़ाँ कर लें
नफ़स को ख़ूँ-फ़िशाँ कर लें क़फ़स को बोस्ताँ कर लें

नज़्म तबा-तबाई




बिछड़ के तुझ से मुझे है उमीद मिलने की
सुना है रूह को आना है फिर बदन की तरफ़

नज़्म तबा-तबाई




दर्द-ए-दिल से इश्क़ के बे-पर्दगी होती नहीं
इक चमक उठती है लेकिन रौशनी होती नहीं

नज़्म तबा-तबाई




दिल इस तरह हवा-ए-मोहब्बत में जल गया
भड़की कहीं न आग न उट्ठा धुआँ कहीं

नज़्म तबा-तबाई