रोज़-ए-सियह में साथ कोई दे तो जानिए
जब तक फ़रोग़-ए-शम्अ है परवाना साथ है
नज़्म तबा-तबाई
सहर को उठते हैं वो देख कर कफ़-ए-रंगीं
अब आइने पे भी सिक्के हिना के बैठ गए
नज़्म तबा-तबाई
तू ने तो अपने दर से मुझ को उठा दिया है
परछाईं फिर रही है मेरी उसी गली में
नज़्म तबा-तबाई
उड़ के जाती है मिरी ख़ाक इधर गाह उधर
कुछ पता दे न गई उम्र-ए-गुरेज़ाँ अपना
नज़्म तबा-तबाई
उड़ाई ख़ाक जिस सहरा में तेरे वास्ते मैं ने
थका-माँदा मिला इन मंज़िलों में आसमाँ मुझ को
नज़्म तबा-तबाई
ये दिल की बे-क़रारी ख़ाक हो कर भी न जाएगी
सुनाती है लब-ए-साहिल से ये रेग-ए-रवाँ मुझ को
नज़्म तबा-तबाई
यूँ मैं सीधा गया वहशत में बयाबाँ की तरफ़
हाथ जिस तरह से आता है गरेबाँ की तरफ़
नज़्म तबा-तबाई

