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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

रोज़-ए-सियह में साथ कोई दे तो जानिए
जब तक फ़रोग़-ए-शम्अ है परवाना साथ है

नज़्म तबा-तबाई




सहर को उठते हैं वो देख कर कफ़-ए-रंगीं
अब आइने पे भी सिक्के हिना के बैठ गए

नज़्म तबा-तबाई




तू ने तो अपने दर से मुझ को उठा दिया है
परछाईं फिर रही है मेरी उसी गली में

नज़्म तबा-तबाई




उड़ के जाती है मिरी ख़ाक इधर गाह उधर
कुछ पता दे न गई उम्र-ए-गुरेज़ाँ अपना

नज़्म तबा-तबाई




उड़ाई ख़ाक जिस सहरा में तेरे वास्ते मैं ने
थका-माँदा मिला इन मंज़िलों में आसमाँ मुझ को

नज़्म तबा-तबाई




ये दिल की बे-क़रारी ख़ाक हो कर भी न जाएगी
सुनाती है लब-ए-साहिल से ये रेग-ए-रवाँ मुझ को

नज़्म तबा-तबाई




यूँ मैं सीधा गया वहशत में बयाबाँ की तरफ़
हाथ जिस तरह से आता है गरेबाँ की तरफ़

नज़्म तबा-तबाई