जो अहल-ए-दिल हैं अलग हैं वो अहल-ए-ज़ाहिर से
न मैं हूँ शैख़ की जानिब न बरहमन की तरफ़
नज़्म तबा-तबाई
काबा ओ बुत-ख़ाना आरिफ़ की नज़र से देखिए
ख़्वाब दोनों एक ही हैं फ़र्क़ है ताबीर में
नज़्म तबा-तबाई
किया है उस ने हर इक से विसाल का वादा
इस इश्तियाक़ में मरना ज़रूरी होता है
नज़्म तबा-तबाई
लोटते रहते हैं मुझ पर चाहने वालों के दिल
वर्ना यूँ पोशाक तेरी मल्गजी होती नहीं
नज़्म तबा-तबाई
मिरी बातों में क्या मालूम कब सोए वो कब जागे
सिरे से इस लिए कहनी पड़ी फिर दास्ताँ मुझ को
नज़्म तबा-तबाई
नशा में सूझती है मुझे दूर दूर की
नद्दी वो सामने है शराब-ए-तुहूर की
नज़्म तबा-तबाई
नज़र कहीं नहीं अब आते हज़रत-ए-नासेह
सुना है घर में किसी मह-लक़ा के बैठ गए
नज़्म तबा-तबाई

