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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

अजब मुश्किल है क्या कहिए बग़ैर-अज़-जान देने के
कोई नक़्शा नज़र आता नहीं आसान मिलने का

नज़ीर अकबराबादी




अकेला उस को न छोड़ा जो घर से निकला वो
हर इक बहाने से मैं उस सनम के साथ रहा

नज़ीर अकबराबादी




अश्कों के तसलसुल ने छुपाया तन-ए-उर्यां
ये आब-ए-रवाँ का है नया पैरहन अपना

नज़ीर अकबराबादी




बाग़ में लगता नहीं सहरा से घबराता है दिल
अब कहाँ ले जा के बैठें ऐसे दीवाने को हम

नज़ीर अकबराबादी




बाग़ में लगता नहीं सहरा से घबराता है दिल
अब कहाँ ले जा के बैठें ऐसे दीवाने को हम

नज़ीर अकबराबादी




बदन गुल चेहरा गुल रुख़्सार गुल लब गुल दहन है गुल
सरापा अब तो वो रश्क-ए-चमन है ढेर फूलों का

नज़ीर अकबराबादी




बंदे के क़लम हाथ में होता तो ग़ज़ब था
सद शुक्र कि है कातिब-ए-तक़दीर कोई और

नज़ीर अकबराबादी