अब बच के कहाँ जाए हर इक सम्त है दीवार
बीवी मिरे पीछे है तो बच्चा मिरे आगे
नज़र बर्नी
इस चश्म-ए-सियह-मस्त पे गेसू हैं परेशाँ
मय-ख़ाने पे घनघोर घटा खेल रही है
नज़र हैदराबादी
इसी ख़याल में हर शाम-ए-इंतिज़ार कटी
वो आ रहे हैं वो आए वो आए जाते हैं
नज़र हैदराबादी
मिट्टी की आवाज़ सुनी जब मिट्टी ने
साँसों की सब खींचा-तानी ख़त्म हुई
नज़र जावेद
वार हर एक मिरे ज़ख़्म का हामिल आया
अपनी तलवार के मैं ख़ुद ही मुक़ाबिल आया
नज़र जावेद
ये तो ऐ 'जावेद' गुज़रे मौसमों की राख है
आख़िरश क्या ढूँढता है तू ख़स-ओ-ख़ाशाक मैं
नज़र जावेद
ज़िंदा रहने के तक़ाज़ों ने मुझे मार दिया
सर पे 'जावेद' अजब अहद-ए-मसाइल आया
नज़र जावेद

