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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

दूसरा ऐसा कहाँ ऐ दश्त ख़ल्वत का मक़ाम
अपनी वीरानी को ले कर मेरे वीराने में आ

नातिक़ गुलावठी




दूसरों को क्या कहिए दूसरी है दुनिया ही
एक एक अपने को हम ने दूसरा पाया

नातिक़ गुलावठी




ग़म-ओ-अंदोह का लश्कर भी चला आता है
एक घोड़-दौड़ सी है उम्र-ए-गुरेज़ाँ के क़रीब

नातिक़ गुलावठी




घर बनाने की बड़ी फ़िक्र है दुनिया में हमें
साहब-ए-ख़ाना बने जाते हैं मेहमाँ हो कर

नातिक़ गुलावठी




गुल शोर कहाँ का है सुन तो सही ओ ज़ालिम
क्या है तिरे कूचे में कैसा है ये वावैला

नातिक़ गुलावठी




गुज़रती है मज़े से वाइ'ज़ों की ज़िंदगी अब तो
सहारा हो गया है दीन दुनिया-दार लोगों का

नातिक़ गुलावठी




हंगामा-ए-हयात से लेना तो कुछ नहीं
हाँ देखते चलो कि तमाशा है राह का

नातिक़ गुलावठी