वो ज़ुल्म भी अब ज़ुल्म की हद तक नहीं करते
आख़िर उन्हें किस बात का एहसास हुआ है
नसीम शाहजहाँपुरी
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अभी वो आँख भी सोई नहीं है
अभी वो ख़्वाब भी जागा हुआ है
नसीर अहमद नासिर
फ़लसफ़े सारे किताबों में उलझ कर रह गए
दर्स-गाहों में निसाबों की थकन बाक़ी रही
नसीर अहमद नासिर
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हवा गुम-सुम खड़ी है रास्ते में
मुसाफ़िर सोच में डूबा हुआ है
नसीर अहमद नासिर
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जब पुकारा किसी मुसाफ़िर ने
रास्ते खाईयों में चीख़ उठे
नसीर अहमद नासिर
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ख़मोशी झाँकती है खिड़कियों से
गली में शोर सा फैला हुआ है
नसीर अहमद नासिर
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लोग फिरते हैं भरे शहर की तंहाई में
सर्द जिस्मों की सलीबों पे उठा कर चेहरे
नसीर अहमद नासिर
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