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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

एहसान नहीं ख़्वाब में आए जो मिरे पास
चोरी की मुलाक़ात मुलाक़ात नहीं है

मुनीर शिकोहाबादी




फ़र्ज़ है दरिया-दिलों पर ख़ाकसारों की मदद
फ़र्श सहरा के लिए लाज़िम हुआ सैलाब का

मुनीर शिकोहाबादी




गालियाँ ज़ख़्म-ए-कुहन को देख कर देती हो क्यूँ
बासी खाने में मिलाते हो तआ'म-ए-ताज़ा आज

मुनीर शिकोहाबादी




गर्मी में तेरे कूचा-नशीनों के वास्ते
पंखे हैं क़ुदसियों के परों के बहिश्त में

मुनीर शिकोहाबादी




गर्मी-ए-हुस्न की मिदहत का सिला लेते हैं
मिशअलें आप के साए से जला लेते हैं

मुनीर शिकोहाबादी




हाथ मिलवाते हो तरसाए गिलौरी के लिए
कफ़-ए-अफ़्सोस न मल जाए कहीं पाँव में

मुनीर शिकोहाबादी




हमेशा मय-कदे में ख़ुश-क़दों का मजमा' है
हज़ारों सर्व लगे हैं कनार-ए-जू-ए-शराब

मुनीर शिकोहाबादी