दम भर रहे हबाब-ए-नमत काएनात में
इस ज़िंदगी में नाम नहीं माह-ओ-साल का
मुनीर शिकोहाबादी
दस बीस हर महीने में अबरू नज़र पड़े
इस साल सारे चाँद हुए तीस तीस के
मुनीर शिकोहाबादी
दश्त-ए-वहशत में नहीं मिलता है साया काँपता
मैं हूँ सौदाई मिरा हम-ज़ाद सौदाई नहीं
मुनीर शिकोहाबादी
दौलत के दाँत कुंद किए मेरे हिर्स ने
खट्टा तमाम शर्बत-ए-दीनार कर दिया
मुनीर शिकोहाबादी
देखा है आशिक़ों ने बरहमन की आँख से
हर बुत ख़ुदा है चाहने वालों के सामने
मुनीर शिकोहाबादी
दीदार का मज़ा नहीं बाल अपने बाँध लो
कुछ मुझ को सूझता नहीं अँधियारी रात है
मुनीर शिकोहाबादी
दिल ले के पलकें फिर गईं ज़ुल्फ़ों की आड़ में
उल्टे फिरी ये फ़ौज सर-ए-शाम लौट के
मुनीर शिकोहाबादी

