सदा-ए-वक़्त की गर बाज़-गश्त सन पाओ
मिरे ख़याल को तुम शाइराना कह देना
मोहसिन भोपाली
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सूरज चढ़ा तो फिर भी वही लोग ज़द में थे
शब भर जो इंतिज़ार-ए-सहर देखते रहे
मोहसिन भोपाली
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उस को चाहा था कभी ख़ुद की तरह
आज ख़ुद अपने तलबगार हैं हम
मोहसिन भोपाली
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उस से मिल कर उसी को पूछते हैं
बे-ख़याली सी बे-ख़याली है
मोहसिन भोपाली
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ज़िंदगी गुल है नग़्मा है महताब है
ज़िंदगी को फ़क़त इम्तिहाँ मत समझ
मोहसिन भोपाली
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अब दुआओं के लिए उठते नहीं हैं हाथ भी
बे-यक़ीनी का तो आलम था मगर ऐसा न था
मोहसिन एहसान
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मैं ख़र्च कार-ए-ज़माना में हो चुका इतना
कि आख़िरत के लिए पास कुछ बचा ही नहीं
मोहसिन एहसान
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