मैं मुनक़्क़श हूँ तिरी रूह की दीवारों पर
तू मिटा सकता नहीं भूलने वाले मुझ को
मोहसिन एहसान
सुब्ह से शाम हुई रूठा हुआ बैठा हूँ
कोई ऐसा नहीं आ कर जो मना ले मुझ को
मोहसिन एहसान
तन्हा खड़ा हूँ मैं भी सर-ए-कर्बला-ए-अस्र
और सोचता हूँ मेरे तरफ़-दार क्या हुए
मोहसिन एहसान
अब के बारिश में तो ये कार-ए-ज़ियाँ होना ही था
अपनी कच्ची बस्तियों को बे-निशाँ होना ही था
मोहसिन नक़वी
अब तक मिरी यादों से मिटाए नहीं मिटता
भीगी हुई इक शाम का मंज़र तिरी आँखें
मोहसिन नक़वी
अज़ल से क़ाएम हैं दोनों अपनी ज़िदों पे 'मोहसिन'
चलेगा पानी मगर किनारा नहीं चलेगा
मोहसिन नक़वी
चुनती हैं मेरे अश्क रुतों की भिकारनें
'मोहसिन' लुटा रहा हूँ सर-ए-आम चाँदनी
मोहसिन नक़वी

