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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

लफ़्ज़ों के एहतियात ने मअ'नी बदल दिए
इस एहतिमाम-ए-शौक़ में हुस्न-ए-असर गया

मोहसिन भोपाली




लफ़्ज़ों को ए'तिमाद का लहजा भी चाहिए
ज़िक्र-ए-सहर बजा है यक़ीन-ए-सहर भी है

मोहसिन भोपाली




'मोहसिन' अपनाइयत की फ़ज़ा भी तो हो
सिर्फ़ दीवार-ओ-दर को मकाँ मत समझ

मोहसिन भोपाली




'मोहसिन' और भी निखरेगा इन शेरों का मफ़्हूम
अपने आप को पहचानेंगे जैसे जैसे लोग

मोहसिन भोपाली




नैरंगी-ए-सियासत-ए-दौराँ तो देखिए
मंज़िल उन्हें मिली जो शरीक-ए-सफ़र न थे

मोहसिन भोपाली




पहले जो कहा अब भी वही कहते हैं 'मोहसिन'
इतना है ब-अंदाज़-ए-दिगर कहने लगे हैं

मोहसिन भोपाली




रौशनी हैं सफ़र में रहते हैं
वक़्त की रहगुज़र में रहते हैं

मोहसिन भोपाली