लफ़्ज़ों के एहतियात ने मअ'नी बदल दिए
इस एहतिमाम-ए-शौक़ में हुस्न-ए-असर गया
मोहसिन भोपाली
लफ़्ज़ों को ए'तिमाद का लहजा भी चाहिए
ज़िक्र-ए-सहर बजा है यक़ीन-ए-सहर भी है
मोहसिन भोपाली
'मोहसिन' अपनाइयत की फ़ज़ा भी तो हो
सिर्फ़ दीवार-ओ-दर को मकाँ मत समझ
मोहसिन भोपाली
'मोहसिन' और भी निखरेगा इन शेरों का मफ़्हूम
अपने आप को पहचानेंगे जैसे जैसे लोग
मोहसिन भोपाली
नैरंगी-ए-सियासत-ए-दौराँ तो देखिए
मंज़िल उन्हें मिली जो शरीक-ए-सफ़र न थे
मोहसिन भोपाली
पहले जो कहा अब भी वही कहते हैं 'मोहसिन'
इतना है ब-अंदाज़-ए-दिगर कहने लगे हैं
मोहसिन भोपाली
रौशनी हैं सफ़र में रहते हैं
वक़्त की रहगुज़र में रहते हैं
मोहसिन भोपाली

