ओसों गई है प्यास कहीं दीदा-ए-नमीं
बुझता है आँसुओं से कहाँ दिल फुंका हुआ
मिर्ज़ा अज़फ़री
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क़सम मय की मुझ बिन है मेरे लहू की
जो हम बिन पियो तो हमारा लहू है
मिर्ज़ा अज़फ़री
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रफ़ू जेब-ए-मजनूँ हुआ कब ऐ नासेह
तू मर जाएगा उस के सीते ही सीते
मिर्ज़ा अज़फ़री
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शिताबी अपने दीवाने को कर बंद
मुसलसल ज़ुल्फ़ से कर या नज़र-बंद
मिर्ज़ा अज़फ़री
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सूनी गई में हुई यार से मुढभेड़ आज
पूछो कोई किस लिए मुँह पे कर ओझल गया
मिर्ज़ा अज़फ़री
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ताक लागी तिरी दुख़्तर से हमारी ऐ ताक
आज शब जी में है घर तेरे ये दामाद रहे
मिर्ज़ा अज़फ़री
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तुझ बिन और हम को सूझता ही नहीं
और तू हम को बूझता ही नहीं
मिर्ज़ा अज़फ़री
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