दिल और शम्अ दोनों बराबर हैं सोख़्ता
उठता है किस जगह से धुआँ देखते रहो
महबूब अज़मि
मौक़ूफ़ है क्यूँ हश्र पे इंसाफ़ हमारा
क़िस्सा जो यहाँ का है तो फिर तय भी यहीं हो
महबूब अज़मि
अल्ताफ़-ओ-करम ग़ैज़-ओ-ग़ज़ब कुछ भी नहीं है
था पहले बहुत कुछ मगर अब कुछ भी नहीं है
महबूब राही
दिन जुदाई का दिया वस्ल की शब के बदले
लेने थे ऐ फ़लक-ए-पीर ये कब के बदले
मेला राम वफ़ा
गो क़यामत से पेशतर न हुई
तुम न आए तो क्या सहर न हुई
मेला राम वफ़ा
इक बार उस ने मुझ को देखा था मुस्कुरा कर
इतनी तो है हक़ीक़त बाक़ी कहानियाँ हैं
मेला राम वफ़ा
इतनी तौहीन न कर मेरी बला-नोशी की
साक़िया मुझ को न दे माप के पैमाने से
मेला राम वफ़ा

