फिर क्या है जो ये रात ढली जाती है आख़िर
वो वादा-फ़रामोश हो ऐसा भी नहीं है
मेराज लखनवी
आँखें हैं मगर ख़्वाब से महरूम हैं 'मिदहत'
तस्वीर का रिश्ता नहीं रंगों से ज़रा भी
मिद्हत-उल-अख़्तर
हम को उसी दयार की मिट्टी हुई अज़ीज़
नक़्शे में जिस का नाम-पता अब नहीं रहा
मिद्हत-उल-अख़्तर
जाने वाले मुझे कुछ अपनी निशानी दे जा
रूह प्यासी न रहे आँख में पानी दे जा
मिद्हत-उल-अख़्तर
जिस्म उस की गोद में हो रूह तेरे रू-ब-रू
फ़ाहिशा के गर्म बिस्तर पर रिया-कारी करूँ
मिद्हत-उल-अख़्तर
ख़्वाबों की तिजारत में यही एक कमी है
चलती है दुकाँ ख़ूब कमाई नहीं देती
मिद्हत-उल-अख़्तर
कूच करने की घड़ी है मगर ऐ हम-सफ़रो
हम उधर जा नहीं सकते जिधर सब गए हैं
मिद्हत-उल-अख़्तर

