गुमरही राह-नुमाई के मुक़ाबिल आई
वक़्त ने देखिए दीवार पे लिक्खा क्या है
मतीन नियाज़ी
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हम तो आशुफ़्ता-सरी से न सँवरने पाए
आप से क्यूँ न सँवारा गया गेसू अपना
मतीन नियाज़ी
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हो न जब तक 'मतीन' कैफ़-ए-ग़म
आदमी को ख़ुदा नहीं मिलता
मतीन नियाज़ी
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हुस्न की बे-रुख़ी को अहल-ए-नज़र
हासिल-ए-इल्तिफ़ात कहते हैं
मतीन नियाज़ी
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कभी कभी तो मोहब्बत की ज़िंदगी के लिए
ख़ुद उन को हम ने उभारा है बरहमी के लिए
मतीन नियाज़ी
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ख़ुदा महफ़ूज़ रक्खे इंतिशार-ए-रहनुमाई से
इसी मंज़िल पे आ के आदमी दीवाना होता है
मतीन नियाज़ी
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'मतीन' उन का करम वाक़ई करम है तो फिर
ये बे-रुख़ी ये तग़ाफ़ुल ये बरहमी क्या है
मतीन नियाज़ी
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