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तुझे संग-दिल ये पता है क्या कि दुखे दिलों की सदा है क्या | शाही शायरी
tujhe sang-dil ye pata hai kya ki dukhe dilon ki sada hai kya

ग़ज़ल

तुझे संग-दिल ये पता है क्या कि दुखे दिलों की सदा है क्या

कलीम आजिज़

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तुझे संग-दिल ये पता है क्या कि दुखे दिलों की सदा है क्या
कभी चोट तू ने भी खाई है कभी तेरा दिल भी दुखा है क्या

तू रईस-ए-शहर-ए-सितम-गराँ मैं गदा-ए-कूचा-ए-आशिक़ाँ
तू अमीर है तो बता मुझे मैं ग़रीब हूँ तो बुरा है क्या

तू जफ़ा में मस्त है रोज़-ओ-शब मैं कफ़न-ब-दोश ग़ज़ल-ब-लब
तिरे रोब-ए-हुस्न से चुप हैं सब मैं भी चुप रहूँ तो मज़ा है क्या

ये कहाँ से आई है सुर्ख़-रू है हर एक झोंका लहू लहू
कटी जिस में गर्दन-ए-आरज़ू ये उसी चमन की हवा है क्या