तुझे संग-दिल ये पता है क्या कि दुखे दिलों की सदा है क्या
कभी चोट तू ने भी खाई है कभी तेरा दिल भी दुखा है क्या
तू रईस-ए-शहर-ए-सितम-गराँ मैं गदा-ए-कूचा-ए-आशिक़ाँ
तू अमीर है तो बता मुझे मैं ग़रीब हूँ तो बुरा है क्या
तू जफ़ा में मस्त है रोज़-ओ-शब मैं कफ़न-ब-दोश ग़ज़ल-ब-लब
तिरे रोब-ए-हुस्न से चुप हैं सब मैं भी चुप रहूँ तो मज़ा है क्या
ये कहाँ से आई है सुर्ख़-रू है हर एक झोंका लहू लहू
कटी जिस में गर्दन-ए-आरज़ू ये उसी चमन की हवा है क्या
ग़ज़ल
तुझे संग-दिल ये पता है क्या कि दुखे दिलों की सदा है क्या
कलीम आजिज़

