हम हैं वो जिंस कि कहते हैं जिसे ग़म 'जुरअत'
है मोहब्बत के सिवा कौन ख़रीदार अपना
जुरअत क़लंदर बख़्श
हम-नशीं उस को जो लाना है तो ला जल्द कि हम
थामे बैठे रहें कब तक दिल-ए-मुज़्तर अपना
जुरअत क़लंदर बख़्श
हशमत-ए-दुनिया की कुछ दिल में हवस बाक़ी नहीं
इश्क़ की दौलत से हैं ऐसे ही आली-जाह हम
जुरअत क़लंदर बख़्श
हिज्र में मुज़्तरिब सा हो हो के
चार-सू देखता हूँ रो रो के
जुरअत क़लंदर बख़्श
हुई पीरी में उस घर की सी हालत ख़ाना-ए-तन की
दर-ओ-दीवार गिर कर जिस मकाँ का उठ नहीं सकता
जुरअत क़लंदर बख़्श
इक बाज़ी-ए-इश्क़ से हैं आरी
खेले हैं वगर्ना सब जुए हम
जुरअत क़लंदर बख़्श
इलाही क्या इलाक़ा है वो जब लेता है अंगड़ाई
मिरे सीने में सब ज़ख़्मों के टाँके टूट जाते हैं
जुरअत क़लंदर बख़्श

