कर लेता हूँ बंद आँखें मैं दीवार से लग कर
बैठे है किसी से जो कोई प्यार से लग कर
जुरअत क़लंदर बख़्श
खाए सो पछताए और पछताए वो भी जो न खाए
ये ग़म-ए-इश्क़-ए-बुताँ लड्डू है गोया बोर का
जुरअत क़लंदर बख़्श
ख़लल इक पड़ गया नाहक़ गुल ओ बुलबुल की सोहबत में
अबस खोला था तू ने बाग़ में ऐ गुल बदन अपना
जुरअत क़लंदर बख़्श
ख़ूबान-ए-जहाँ की है तिरे हुस्न से ख़ूबी
तू ख़ूब न होता तो कोई ख़ूब न होता
जुरअत क़लंदर बख़्श
की बे-ज़री फ़लक ने हवाले नजीब के
पाजी हर एक साहब-ए-ज़र आए है नज़र
जुरअत क़लंदर बख़्श
किश्त-ए-दिल फ़ौज-ए-ग़म ने की ताराज
तिस पे तू माँगने ख़िराज आया
जुरअत क़लंदर बख़्श
क्या क्या किया है कूचा-ब-कूचा मुझे ख़राब
ख़ाना ख़राब हो दिल-ए-ख़ाना-ख़राब का
जुरअत क़लंदर बख़्श

