इतना मानूस हूँ फ़ितरत से कली जब चटकी
झुक के मैं ने ये कहा मुझ से कुछ इरशाद किया?
जोश मलीहाबादी
जितने गदा-नवाज़ थे कब के गुज़र चुके
अब क्यूँ बिछाए बैठे हैं हम बोरिया न पूछ
जोश मलीहाबादी
काम है मेरा तग़य्युर नाम है मेरा शबाब
मेरा ना'रा इंक़िलाब ओ इंक़िलाब ओ इंक़िलाब
जोश मलीहाबादी
कश्ती-ए-मय को हुक्म-ए-रवानी भी भेज दो
जब आग भेज दी है तो पानी भी भेज दो
जोश मलीहाबादी
किसी का अहद-ए-जवानी में पारसा होना
क़सम ख़ुदा की ये तौहीन है जवानी की
जोश मलीहाबादी
कोई आया तिरी झलक देखी
कोई बोला सुनी तिरी आवाज़
जोश मलीहाबादी
महफ़िल-ए-इश्क़ में वो नाज़िश-ए-दौराँ आया
ऐ गदा ख़्वाब से बेदार कि सुल्ताँ आया
जोश मलीहाबादी

