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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

इतना मानूस हूँ फ़ितरत से कली जब चटकी
झुक के मैं ने ये कहा मुझ से कुछ इरशाद किया?

जोश मलीहाबादी




जितने गदा-नवाज़ थे कब के गुज़र चुके
अब क्यूँ बिछाए बैठे हैं हम बोरिया न पूछ

जोश मलीहाबादी




काम है मेरा तग़य्युर नाम है मेरा शबाब
मेरा ना'रा इंक़िलाब ओ इंक़िलाब ओ इंक़िलाब

जोश मलीहाबादी




कश्ती-ए-मय को हुक्म-ए-रवानी भी भेज दो
जब आग भेज दी है तो पानी भी भेज दो

जोश मलीहाबादी




किसी का अहद-ए-जवानी में पारसा होना
क़सम ख़ुदा की ये तौहीन है जवानी की

जोश मलीहाबादी




कोई आया तिरी झलक देखी
कोई बोला सुनी तिरी आवाज़

जोश मलीहाबादी




महफ़िल-ए-इश्क़ में वो नाज़िश-ए-दौराँ आया
ऐ गदा ख़्वाब से बेदार कि सुल्ताँ आया

जोश मलीहाबादी