तेरा मेरा कोई रिश्ता तो नहीं है लेकिन
मैं ने जो ख़्वाब में देखा है कोई देख न ले
जावेद सबा
उस ने आँचल से निकाली मिरी गुम-गश्ता बयाज़
और चुपके से मोहब्बत का वरक़ मोड़ दिया
जावेद सबा
वहशत का ये आलम कि पस-ए-चाक गरेबाँ
रंजिश है बहारों से उलझते हैं ख़िज़ाँ से
जावेद सबा
ये जो महफ़िल में मिरे नाम से मौजूद हूँ मैं
मैं नहीं हूँ मिरा धोका है कोई देख न ले
जावेद सबा
अजनबी बूद-ओ-बाश के क़ुर्ब-ओ-जवार में मिला
बिछड़ा तो वो मुझे किसी और दयार में मिला
जावेद शाहीन
डूबने वाला था दिन शाम थी होने वाली
यूँ लगा मिरी कोई चीज़ थी खोने वाली
जावेद शाहीन
हिसाब-ए-दोस्ताँ करने ही से मालूम ये होगा
ख़सारे में हूँ या अब मैं ख़सारे से निकल आया
जावेद शाहीन

