आहट भी अगर की तो तह-ए-ज़ात नहीं की
लफ़्ज़ों ने कई दिन से कोई बात नहीं की
जावेद नासिर
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बहुत उदास था उस दिन मगर हुआ क्या था
हर एक बात भली थी तो फिर बुरा क्या था
जावेद नासिर
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दश्त की धूप है जंगल की घनी रातें हैं
इस कहानी में बहर हाल कई बातें हैं
जावेद नासिर
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दोस्तो तुम से गुज़ारिश है यहाँ मत आओ
इस बड़े शहर में तन्हाई भी मर जाती है
जावेद नासिर
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घड़ी जो बीत गई उस का भी शुमार किया
निसाब-ए-जाँ में तिरी ख़ामुशी भी शामिल की
जावेद नासिर
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जुम्बिश-ए-मेहर है हर लफ़्ज़ तिरी बातों का
रंग उड़ता नहीं आँखों से मुलाक़ातों का
जावेद नासिर
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ख़ुदा आबाद रक्खे ज़िंदगी को
हमारी ख़ामुशी को सह गई है
जावेद नासिर
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