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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

उन को तो सहल है वो ग़ैर के घर जाएँगे
हम जो उस दर से उठेंगे तो किधर जाएँगे

जावेद लख़नवी




ये इक बोसे पे इतनी बहस ये ज़ेबा नहीं तुम को
नहीं है याद मुझ को ख़ैर अच्छा ले लिया होगा

जावेद लख़नवी




इक न इक दिन तो मुसख़्ख़र उस को होना है 'नदीम'
वो ख़लाओं का मकीं है नूर की रफ़्तार मैं

जावेद नदीम




जो रहनुमा थे मेरे कहाँ हैं वो नक़्श-ए-पा
मंज़िल पे छोड़ता था जो रस्ता किधर गया

जावेद नदीम




कौन सुनता है यहाँ पस्त-सदाई इतनी
तुम अगर चीख़ के बोलो तो असर भी होगा

जावेद नदीम




ये किस के आसमाँ की हदों में छुपा हूँ मैं
अपनी ज़मीं से उठ के कहाँ आ गया हूँ मैं

जावेद नदीम




बे-साया न हो जाए कहीं घर मिरा यारब
कुछ दिन से मैं झुकता ये शजर देख रहा हूँ

जावेद नसीमी