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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

एक ये दिन जब अपनों ने भी हम से नाता तोड़ लिया
एक वो दिन जब पेड़ की शाख़ें बोझ हमारा सहती थीं

जावेद अख़्तर




ग़ैरों को कब फ़ुर्सत है दुख देने की
जब होता है कोई हमदम होता है

जावेद अख़्तर




ग़लत बातों को ख़ामोशी से सुनना हामी भर लेना
बहुत हैं फ़ाएदे इस में मगर अच्छा नहीं लगता

जावेद अख़्तर




है पाश पाश मगर फिर भी मुस्कुराता है
वो चेहरा जैसे हो टूटे हुए खिलौने का

जावेद अख़्तर




हम तो बचपन में भी अकेले थे
सिर्फ़ दिल की गली में खेले थे

जावेद अख़्तर




हर तरफ़ शोर उसी नाम का है दुनिया में
कोई उस को जो पुकारे तो पुकारे कैसे

जावेद अख़्तर




इक खिलौना जोगी से खो गया था बचपन में
ढूँढता फिरा उस को वो नगर नगर तन्हा

जावेद अख़्तर