EN اردو
2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

नेकी इक दिन काम आती है हम को क्या समझाते हो
हम ने बे-बस मरते देखे कैसे प्यारे प्यारे लोग

जावेद अख़्तर




फिर ख़मोशी ने साज़ छेड़ा है
फिर ख़यालात ने ली अंगड़ाई

जावेद अख़्तर




सब का ख़ुशी से फ़ासला एक क़दम है
हर घर में बस एक ही कमरा कम है

जावेद अख़्तर




तब हम दोनों वक़्त चुरा कर लाते थे
अब मिलते हैं जब भी फ़ुर्सत होती है

जावेद अख़्तर




थीं सजी हसरतें दुकानों पर
ज़िंदगी के अजीब मेले थे

जावेद अख़्तर




तुम ये कहते हो कि मैं ग़ैर हूँ फिर भी शायद
निकल आए कोई पहचान ज़रा देख तो लो

जावेद अख़्तर




उस दरीचे में भी अब कोई नहीं और हम भी
सर झुकाए हुए चुप-चाप गुज़र जाते हैं

जावेद अख़्तर