झूट और मुबालग़े ने अफ़्सोस
इज़्ज़त खो दी सुख़नवरी की
इस्माइल मेरठी
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जिस ने चश्म-ए-मस्त-ए-साक़ी देख ली
ता क़यामत उस पे हुश्यारी हराम
इस्माइल मेरठी
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कभी भूल कर किसी से न करो सुलूक ऐसा
कि जो तुम से कोई करता तुम्हें नागवार होता
इस्माइल मेरठी
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खोला है मुझ पे सिर्र-ए-हक़ीक़त मजाज़ ने
ये पुख़्तगी सिला है ख़यालात-ए-ख़ाम का
इस्माइल मेरठी
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ख़्वाहिशों ने डुबो दिया दिल को
वर्ना ये बहर-ए-बे-कराँ होता
इस्माइल मेरठी
कुछ मिरी बात कीमिया तो न थी
ऐसी बिगड़ी कि फिर बनी ही नहीं
इस्माइल मेरठी
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कुछ न बन आएगी जब लूट मचाएगी ख़िज़ाँ
ग़ुंचा हर-चंद गिरह कस के ज़र-ए-गुल बाँधे
इस्माइल मेरठी
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