है आज रुख़ हवा का मुआफ़िक़ तो चल निकल
कल की किसे ख़बर है किधर की हवा चले
इस्माइल मेरठी
है आज रुख़ हवा का मुआफ़िक़ तो चल निकल
कल की किसे ख़बर है किधर की हवा चले
इस्माइल मेरठी
है अश्क-ओ-आह रास हमारे मिज़ाज को
यानी पले हुए इसी आब-ओ-हवा के हैं
इस्माइल मेरठी
है इस अंजुमन में यकसाँ अदम ओ वजूद मेरा
कि जो मैं यहाँ न होता यही कारोबार होता
इस्माइल मेरठी
हर शक्ल में था वही नुमूदार
हम ने ही निगाह-ए-सरसरी की
इस्माइल मेरठी
इज़हार-ए-हाल का भी ज़रीया नहीं रहा
दिल इतना जल गया है कि आँखों में नम नहीं
इस्माइल मेरठी
जब ग़ुंचे को वाशुद हुई तहरीक सबा से
बुलबुल से अजब क्या जो करे नग़्मा-सराई
इस्माइल मेरठी

