शैख़ और बरहमन में अगर लाग है तो हो
दोनों शिकार-ए-ग़म्ज़ा उसी दिल-रुबा के हैं
इस्माइल मेरठी
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सुब्ह के भूले तो आए शाम को
देखिए कब आएँ भूले शाम के
इस्माइल मेरठी
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तारीफ़ उस ख़ुदा की जिस ने जहाँ बनाया
कैसी ज़मीं बनाई क्या आसमाँ बनाया
इस्माइल मेरठी
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तासीर हो क्या ख़ाक जो बातों में घड़त हो
कुछ बात निकलती है तो बे-साख़्ता-पन में
इस्माइल मेरठी
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थी छेड़ उसी तरफ़ से वर्ना
मैं और मजाल आरज़ू की
इस्माइल मेरठी
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तुम्हारे दिल से कुदूरत मिटाए तो जानें
खुला है शहर में इक महकमा सफ़ाई का
इस्माइल मेरठी
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तू ही ज़ाहिर है तू ही बातिन है
तू ही तू है तो मैं कहाँ तक हूँ
इस्माइल मेरठी
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