ख़ाकिस्तर-ए-दिल में तो न था एक शरर भी
बेकार उसे बर्बाद किया मौज-ए-सबा ने
इक़बाल सुहैल
कुछ ऐसा है फ़रेब-ए-नर्गिस-ए-मस्ताना बरसों से
कि सब भूले हुए हैं काबा ओ बुत-ख़ाना बरसों से
इक़बाल सुहैल
न रहा कोई तार दामन में
अब नहीं हाजत-ए-रफ़ू मुझ को
इक़बाल सुहैल
वो शबनम का सुकूँ हो या कि परवाने की बेताबी
अगर उड़ने की धुन होगी तो होंगे बाल-ओ-पर पैदा
इक़बाल सुहैल
तमाम दिन मुझे सूरज के साथ चलना था
मिरे सबब से मिरे हम-सफ़र पे धूप रही
इक़बाल उमर
तमाम मसअले नौइयत-ए-सवाल के हैं
जवाब होते हैं सारे सवाल के अंदर
इक़तिदार जावेद
अकेले पार उतर के बहुत है रंज मुझे
मैं उस का बोझ उठा कर भी तैर सकता था
इरफ़ान अहमद

