प्यार करने भी न पाया था कि रुस्वाई मिली
जुर्म से पहले ही मुझ को संग-ए-ख़म्याज़ा लगा
इक़बाल साजिद
प्यासो रहो न दश्त में बारिश के मुंतज़िर
मारो ज़मीं पे पाँव कि पानी निकल पड़े
इक़बाल साजिद
रोए हुए भी उन को कई साल हो गए
आँखों में आँसुओं की नुमाइश नहीं हुई
इक़बाल साजिद
'साजिद' तू फिर से ख़ाना-ए-दिल में तलाश कर
मुमकिन है कोई याद पुरानी निकल पड़े
इक़बाल साजिद
सज़ा तो मिलना थी मुझ को बरहना लफ़्ज़ों की
ज़बाँ के साथ लबों को रफ़ू भी होना था
इक़बाल साजिद
सूरज हूँ चमकने का भी हक़ चाहिए मुझ को
मैं कोहर में लिपटा हूँ शफ़क़ चाहिए मुझ को
इक़बाल साजिद
सूरज हूँ ज़िंदगी की रमक़ छोड़ जाऊँगा
मैं डूब भी गया तो शफ़क़ छोड़ जाऊँगा
इक़बाल साजिद

