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सरसब्ज़ दिल की कोई भी ख़्वाहिश नहीं हुई | शाही शायरी
sarsabz dil ki koi bhi KHwahish nahin hui

ग़ज़ल

सरसब्ज़ दिल की कोई भी ख़्वाहिश नहीं हुई

इक़बाल साजिद

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सरसब्ज़ दिल की कोई भी ख़्वाहिश नहीं हुई
वो है ज़मीन-ए-दिल जहाँ बारिश नहीं हुई

रोए हुए भी उन को कई साल हो गए
आँखों में आँसुओं की नुमाइश नहीं हुई

दीवार-ओ-दर हैं पास मगर इन के बावजूद
अपने ही घर में अपनी रिहाइश नहीं हुई

बाब-ए-सुख़न में अब वही मशहूर हो गए
वो जिन के ज़ेहन से कोई काविश नहीं हुई