उस संग-दिल के हिज्र में चश्मों को अपने आह
मानिंद-ए-आबशार किया हम ने क्या किया
इंशा अल्लाह ख़ान
ये अजीब माजरा है कि ब-रोज़-ए-ईद-ए-क़ुर्बां
वही ज़ब्ह भी करे है वही ले सवाब उल्टा
इंशा अल्लाह ख़ान
ज़मीं से उट्ठी है या चर्ख़ पर से उतरी है
ये आग इश्क़ की या-रब किधर से उतरी है
इंशा अल्लाह ख़ान
रू-ब-रू आईने के मैं हूँ नज़र वो आए
हो भी सकता है ये होना मगर आसान नहीं
इन्तेसार हुसैन आबिदी शाहिद
अपने बदन को छोड़ के पछताओगे मियाँ
बाहर हवा है तेज़ बिखर जाओगे मियाँ
इंतिख़ाब सय्यद
लोग न जाने कैसी कैसी बातें करते हैं
मेरे पास तो मेरा साया लेटा है चुप-चाप
इंतिख़ाब सय्यद
आज फिर नींद को आँखों से बिछड़ते देखा
आज फिर याद कोई चोट पुरानी आई
इक़बाल अशहर

