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शोर से बच कर सहमा सहमा बैठा है चुप-चाप | शाही शायरी
shor se bach kar sahma sahma baiTha hai chup-chap

ग़ज़ल

शोर से बच कर सहमा सहमा बैठा है चुप-चाप

इंतिख़ाब सय्यद

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शोर से बच कर सहमा सहमा बैठा है चुप-चाप
हंगामों का बानी देखो कैसा है चुप-चाप

अपने मन के पागल-पन को और कहाँ ले जाएँ
दूर दूर तक रेत का सहरा लेटा है चुप-चाप

अंग अंग में लम्स की ख़ुशबू पेंगें लेती है
अंग अंग में जैसे कोई बैठा है चुप-चाप

रिश्तों की दीवारें ढा कर मेरे जैसा शख़्स
दिन के ज़र्द पहाड़ के पीछे उतरा है चुप-चाप

लोग न जाने कैसी कैसी बातें करते हैं
मेरे पास तो मेरा साया लेटा है चुप-चाप